भोपाल. कोलार आवर्धन योजना में फर्जी बैंक गारंटी के आधार पर ठेकेदार को फायदा पहुंचाने के मामले में लोकायुक्त पुलिस ने तत्कालीन नगर निगम आयुक्त विनय निगम , कार्यपालन यंत्री संजय अंधवान, सीनियर ऑडिटर बीएल सहरवार व नई दिल्ली की फर्म सुभाष प्रोजेक्ट पर मामला दर्ज कर लिया है।
विनय निगम, पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती के ओएसडी हैं। उमा के मुख्यमंत्री बनने के बाद ही उन्हें भोपाल नगर निगम की कमान दी गई थी। अंधवान वर्तमान में ग्वालियर में पीएचई में अधीक्षण यंत्री हैं।
कोलार जल प्रदाय आवर्धन योजना के अंतर्गत पाइपलाइन बिछाने का टेंडर 17 अक्टूबर 2002 को दिल्ली के सुभाष प्रोजेक्ट को दिया गया था। 38 करोड़ रुपए के इस टेंडर में 5 करोड़ रुपए से ज्यादा की बैंक गारंटी ठेकेदार द्वारा रखी गई थी। इसमें 2 करोड़ 57 लाख रुपए की बैंक गारंटी फर्जी तरीके से तैयार की गई थी।
बैंक गारंटी की वैधता 31 जुलाई 2005 तक थी, लेकिन नगर निगम ने निर्धारित तिथि से पहले न तो बैंक गारंटी का नवीनीकरण कराया न ही नगदीकरण किया। उल्टे ठेकेदार को 52 लाख 41 हजार रुपए अधिक की बैंक गारंटी वापस कर दी। इस मामले की शिकायत लोकायुक्त को वर्ष 2005 में की गई थी।
मामले की जांच लोकायुक्त की तकनीकी शाखा कर रही थी। जांच में यह पाया गया कि बैंक गारंटी फर्जी थी और नगर निगम के अधिकारियों ने अपने पद का दुरूपयोग करते हुए कंपनी को फायदा पहुंचाया। इस मामले में विभागीय जांच में भी अधिकारी दोषी पाए गए थे।
विनय निगम, पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती के ओएसडी हैं। उमा के मुख्यमंत्री बनने के बाद ही उन्हें भोपाल नगर निगम की कमान दी गई थी। अंधवान वर्तमान में ग्वालियर में पीएचई में अधीक्षण यंत्री हैं।
कोलार जल प्रदाय आवर्धन योजना के अंतर्गत पाइपलाइन बिछाने का टेंडर 17 अक्टूबर 2002 को दिल्ली के सुभाष प्रोजेक्ट को दिया गया था। 38 करोड़ रुपए के इस टेंडर में 5 करोड़ रुपए से ज्यादा की बैंक गारंटी ठेकेदार द्वारा रखी गई थी। इसमें 2 करोड़ 57 लाख रुपए की बैंक गारंटी फर्जी तरीके से तैयार की गई थी।
बैंक गारंटी की वैधता 31 जुलाई 2005 तक थी, लेकिन नगर निगम ने निर्धारित तिथि से पहले न तो बैंक गारंटी का नवीनीकरण कराया न ही नगदीकरण किया। उल्टे ठेकेदार को 52 लाख 41 हजार रुपए अधिक की बैंक गारंटी वापस कर दी। इस मामले की शिकायत लोकायुक्त को वर्ष 2005 में की गई थी।
मामले की जांच लोकायुक्त की तकनीकी शाखा कर रही थी। जांच में यह पाया गया कि बैंक गारंटी फर्जी थी और नगर निगम के अधिकारियों ने अपने पद का दुरूपयोग करते हुए कंपनी को फायदा पहुंचाया। इस मामले में विभागीय जांच में भी अधिकारी दोषी पाए गए थे।

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